Monthly Archives: March 2017

Gazal 

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ग़ज़ल                  غزل 

ایک آوارہ سی پرچھائی کا سایہ میں ہوں. 
تنہا رہتی ہوئی تنہائی کا سایہ میں ہوں.
एक आवारा सी परछाई का साया मैं हूँ।

तनहा रहती हुई तन्हाई का साया मैं हूँ।
غم کے سورج کی تپش اس کو نہ چھُو پائے گی. 

اپنے معصوم سے اک بھائی کا سایہ میں ہوں. 
ग़म के सूरज की तपिश इस को ना छु पाएगी।

अपने मासूम से इक भाई का साया मैं हूँ।
کھیلتی ہے جو ترے جسم کی شاخوں سے سدا. 

دیکھ مجھ کو اسی پُروائی کا سایہ میں ہوں. 
खेलती है जो तेरे जिस्म की शाखों से सदा।

देख मुझ को उसी पुरवाई का साया मैं हूँ।
میں تھکن ہوں تری راتوں کے حسیں لمحوں کی. 

اور ترے جسم کی انگڑائی کا سایہ میں ہوں. 
मैं थकन हूँ तेरी रातों के हंसी लम्हों की।

और तेरे जिस्म की अंगड़ाई का साया मैं हूँ।
حق پرستوں نے عقیدت سے مجھے چُوما ہے.

میں تو سچائی ہوں سچائی کا سایہ میں ہوں. 
हकपरस्तों ने अक़ीदत से मुझे चूमा है।

मैं तो सच्चाई हूँ सच्चाई का साया मैं हूँ।
جو بھی رسوائی ہے منسوب مرے نام سے ہے.

ایسا لگتا ہے کہ رسوائی کا سایہ میں ہوں. 
जो भी रुसवाई है मनसूब मेरे नाम से है।

ऐसा लगता है के रुसवाई का साया मैं हूँ।

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